हयग्रीव जयंती
कौतूहल से भर जाता हूँ कि श्रावण पूर्णिमा के रोज़ क्या क्या नहीं होता? श्रावणी, रक्षाबंधन व विश्व संस्कृत दिवस के साथ साथ हयग्रीव जयंती भी होती है। ऐसे में यदि विष्णु के हयग्रीव अवतार के साथ-साथ गिटार के तारों की सुधि न आई, तो संस्कृत का विद्यार्थी कैसा? और फिर इन सुधियों में, गिटार के तारों का चढ़ान न किया, तो क्या किया? तो साहिबान, मेरी शब्दों की दुनिया के दोस्तो, ये बड़े ही प्राचीन काल की बात है। घोड़े के सामान ग्रीवा और मुखाकृति का एक दैत्य हुआ। उसका नाम था : “हयग्रीव”। उसने आदिशक्ति की उपासना से अमृत्व का वरदान प्राप्त करने के प्रयत्न किए। किन्तु आदिशक्ति ने ऐसा वरदान देने से इनकार कर दिया। वैसी स्थिति में, हयग्रीव ने कहा : “माते! ऐसा वरदान दीजिए कि मेरी मृत्यु हयग्रीव के ही हाथों हो!” -- इस वरदान को प्राप्त कर हयग्रीव को ऐसा लगता था कि वो स्वयं तो स्वयं को मारेगा नहीं। अतः अब वो अमर हो चुका है। फिर एक रोज़, श्रीहरि विष्णु ने अपनी योगमाया को निमंत्रण दिया। और "हयग्रीव" जैसा रूप लेकर "हयग्रीव" का वध किया! पूरी कहानी का रसरंग इस तथ्य में है कि उन्होंने "हयग्रीव...