Posts

हम जटायु

Image
आज कार्तिक शुक्ल द्वादशी है और सदियों पश्चात्, अंततोगत्वा, प्रभु श्रीराम अपने अयोध्या निज आगमन के मार्ग पर प्रथम चरण धर चुके हैं। सुखद आश्चर्य ये है कि ये पूरा आयोजन बड़ा असूचित रहा! ठीक भी है, अब हम सब श्री भरत जितने भाग्यशाली कहाँ कि प्रभु अपने आगमन की ख़बर भिजवाते। बल्कि हम तो जटायु की भांति आहत घायल होकर श्रीराम की प्रतीक्षा कर रह रहे थे। मेरे राम, हम सब तो आपके जटायु थे! बाबा तुलसी ने हमारे ही लिए लिक्खा था : “आगें परा गीधपति देखा / सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा!” -- अर्थात् प्रभु ने अपने मार्ग में आगे पड़े विशालकाय पंछी को देखा, जोकि श्रीराम की चरण रेखाओं का चिंतन कर रहा था! सो, मेरे राम! हम आपकी प्रतीक्षा में, दंडकारण्य की किसी पगडण्डी पर, अपनी आस्था-पाँखों को खो चुके जटायु थे। और हमारे पास आपके चरण-तलवों की लालिम-श्वेतिमा के सुमिरन के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं। गौर से देखा जावै, तो पीठ मोड़कर दौड़ जाने वालों के तलवे ही देखने वाले के नेत्रों का केंद्र बनते हैं। सो, वनगमन के प्रसंग में श्रीराम के तलवे ही अयोध्यावासियों के चंद्रमा बने होंगे, प्रतिपल दूर दूर और सुदूर होते जा रहे तलवे! हमने तो...

पूर्वी अयोध्या

Image
ये कहानी इतिहास के उन पन्नों की है, जिन्हें आज फड़फड़ाने की भी इजाज़त नहीं! सदियों पहले, कमसकम आठ सदी पहले, भारत के एक अज्ञात क्षत्रिय राजवंश का युवा राजपुत्र राज्य से निष्कासित कर दिया गया। उसका अपराध क्या था, ये तक उगलने की इजाज़त इतिहास के पन्नों को नहीं। इतिहास के टूटे पुर्ज़े, कई कड़ियों में, बस इतना बता पाते हैं कि उस राजपुत्र को न केवल राज्य में, बल्कि इस पूरी भारतभूमि में उसके निवास करने पर मनाही थी। वैसी स्थिति में वो कहाँ जाता? उत्तर का छोर पकड़ता तो रम्यकवर्ष का अज्ञात क्षेत्र था। जो वो पश्चिम का मार्ग लेता, तो म्लेच्छों के क्षेत्र में निहत्थे क्षत्रिय का होना घोर अदूरदर्शिता कहलाती। और दक्षिण में तो समुद्र तक महान भारतभूमि ही फैली थी, जहाँ उसका निवास निषिद्ध था। वैसी स्थिति में, वो जाता तो कहाँ जाता? केवल पूरब ही सुरक्षित विकल्प था, सो उस निष्कासित राजपुत्र के पाँव भी पूरब की ओर मुड़ गए। और वो सुदूर पूरब के द्वीप स्यामदेश पर जा पहुँचा। उस राजपुत्र ने सुदूर पूरब में प्रवास किया, निवास किया, भोजन आदि की नियमित व्यवस्था की और तब कहीं जाकर उस क्षेत्र की लोकमान्यताओं से लेकर संस...

अपने अपने राम

Image
बड़ा बयान है : "राम का कोई जीवित वंशज हो तो सम्मुख आए!" और इससे भी बड़ी बात ये है कि इस बयान से समूचा हिन्दू जनमानस पीड़ित नहीं हुआ है। तमाम जातीय समूह ऐसे भी हैं, जो इसे केवल सवर्णों या केवल क्षत्रियों का अपमान या उनपर प्रश्नचिन्ह मान कर मन ही मन खुश हो रहे हैं। जानते हैं इसका क्या कारण है? इसका कारण है, एक बड़ा प्रसिद्ध फ्रेज : "अपने अपने राम!" ,बड़ी शिद्दत से इसे लगभग हर हिन्दू मानता है कि हर एक के राम अलग हैं! बस यहीं, इसी फ्रेज पर आकर, ठीक यहीं इसी बिंदु पर राम को लेकर हिन्दू जनमानस में लेयर्स बन जाती हैं। हर एक के व्यक्तिगत मत की अपनी एक अलग लेयर है। और इन्हीं लेयर्स के बीच में आए सूक्ष्म अंतर में विरोधी तत्त्वों का प्रवेश होता है। जबकि होना ये चाहिए था कि राम केवल "अपने" होते, न कि अपने अपने! मैं कहता हूँ कि आज कोर्ट द्वारा दिया गया बयान न केवल समूचे हिन्दू समाज का अपमान है, न केवल उनपर लगाया गया प्रश्नचिन्ह है बल्कि ये बौद्ध समाज के समूचे अस्तित्व का प्रश्न है। चूंकि कपिलवस्तु का शाक्यकुल भी सूर्यवंशी था। भगवान् बुद्ध भी श्रीराम की परंपरा से आते हैं। अग...

अयोध्या जी-६

Image
हे रामजन्मभूमि! सत्ताईसवीं मुक्तिगाँठ पर क्या लिख दें, हम रामभक्त? एक लेख तो क्या, एक ग्रन्थ भी पर्याप्त नहीं है, प्रिय रामभक्त बंधुओ। चूँकि अयोध्या जी अपने आप में एक “ग्रन्थ”, एक “नदी” और एक “प्रजा” का सम्पूर्ण संयोजन हैं। दुनिया के किसी भी शहर का इतिहास उठा कर देखा जाए, उक्त तीनों चीज़ें एकसाथ किसी शहर के पास नहीं मिलेंगी। -- यदि उस शहर के स्वामित्व में अपना “ग्रन्थ” होगा तो अब “नदी” शेष न होगी। यदि “नदी” रह गई होगी तो अब महज शहर बसा होगा, उसका कोई “ग्रन्थ” शेष न होगा। यदि “ग्रन्थ” और “नदी”, दोनों विद्यमान हैं, तो? ...तो इतिहास उठा कर देख लीजिए, निश्चित ही वो शहर ख़ाक में मिला दिया गया होगा! समूचे संसार में, केवल और केवल अयोध्या जी ही हैं, जिनकी “प्रजा”, जिनका “ग्रन्थ” और जिनकी “नदी” अब तलक सुरक्षित है। यही कारण है कि इस नगरी के हृदयङ्गत वैभव के सम्मुख, इसका दुनियावी बेजोड़ आकर्षण भी फीका है। भले इक्ष्वाकु, मांधाता, दिलीप, सगर, अज, दशरथ और श्रीराम जैसे राजाओं ने इस भूमि में धंसे पत्थरों को अपनी कुदालों से तराशा है, किन्तु फिर भी, संसार के हर हिन्दू के हृदय में एक अलग ही अयोध्या जी निर्म...

अयोध्या जी-५

Image
भला भावुक हृदय से कोई क्या लिख सकता है? किन्तु जैसी स्थिति आज निर्मित हुई है, वैसी स्थिति में मौन रह पाना भी कठिन है।  मौन न रह पाने के कारणों की तह में जाऊं, तो जेरूसलम शहर के विषय में प्रसिद्ध यहूद कहावत याद आती है, जिसे मैंने अयोध्या जी लिए अपने मन में धर लिया था-- “हर हिन्दू के हृदय में दो शहर होते हैं : एक उसका जन्मस्थान और दूजीं उसके आराध्य की जन्मस्थली, अयोध्या जी!” इसीलिए मैं अक़्सर कहता हूँ, भले हिन्दुस्तान की राजधानी दिल्ली है, किन्तु हिन्दुओं की राजधानी तो अयोध्या जी हैं। एक ऐतिहासिक स्थान किन्तु हिन्दुओं का मर्म भी, एक कोमल नगरी। इस पवित्र नगरी की कोमलता का परचम कुछ यों है कि समूचा सनातन साहित्य इन्हें एक जीवित स्त्री की भांति मानता है! इतिहास का एक दौर था, जब अयोध्या जी सौन्दर्य का प्रतीक हुआ करती थीं, हर राजवंश अपनी राजधानी को वैसा बनाना चाहता था। किन्तु आज? आज वे एक आहत, घायल और कैद राजकुमारी अधिक कुछ भी नहीं! समग्र संस्कृत साहित्य ने “अयोध्या” शब्द को आकारान्त-स्त्रीलिङ्ग शब्द की भांति प्रयोजा है, यानी कि ऐसा शब्द जो “आ” की ध्वनि से अंत हो और स्त्रीलिंग हो। अयोध्या ज...

अयोध्या जी-४

Image
सुना कि, बीते दिनों मोदी जी अयोध्या की सीमाओं को छूकर निकल गए। वही "अयोध्या" जो एक किताब, नदी और नगरी का सम्पूर्ण संयोजन है। आप दुनिया के किसी शहर का इतिहास उठा कर देख लीजिए, तीनों चीज़ें किसी शहर के पास नहीं होंगी! यदि उस शहर की किताब होगी तो उसके पास "नदी" न होगी। यदि नदी होगी तो सिर्फ शहर बसा होगा, कोई किताब न होगी उसकी। और यदि किताब और नदी, दोनों होंगी तो अब वो शहर ख़ाक में मिल गया होगा। उठा कर देखिए इतिहास! समूचे संसार में, केवल और केवल अयोध्या है जिसका शहर, जिसकी किताब और जिसकी "नदी" अब तलक सुरक्षित है! इस शहर के हृदयगत वैभव के सम्मुख, इसका दुनियावी बेजोड़ आकर्षण भी फीका है! संसार के हर हिन्दू के हृदय में "अयोध्या" बनाई गई है। उनमें से हर एक के पास "अयोध्या" को देखने का अपना अलग नजरिया है। इक्ष्वाकु, मांधाता, दिलीप, सगर, अज, दशरथ और श्रीराम जैसे राजाओं ने इस भूमि में धंसे पत्थरों को तोडा है। अब्राहमिक धर्मों से इतर कुछ भी अगर है इस संसार में तो उसने इसी स्थान से अपनी शुरुआत की है। ये कहना भी अतिशियोक्ति न होगी कि राष्ट्र में सौ करोड़ ...

अयोध्या जी-३

Image
यदि आप हिन्दू हैं तो आपको एक बार "अयोध्या" अवश्य आना चाहिए। हालाँकि, ये शहर "इन्टरनेट" को मिथकीय बातें बनाने पर मजबूर करता है। मगर ये चाहता है कि इसे एक बार करीब से देखा जाए। ये शहर दुनियावी आकर्षण का केंद्र है। या यों कहूँ कि ये महज एक शहर नहीं बल्कि षड्यंत्रों को अल्हड बुलावा देता हुआ एक जगमगाता जुगनू है। ये शहर आपकी तमाम वैचारिक प्यासों को बुझा देगा! ये शहर दुनिया के कैमरों को एक बेहतरीन मंच मुहैया करवाता है। आपकी राजनीतिक और धार्मिक दिलचस्पियों को अकेला ही बुझा सकने में समर्थ है "अयोध्या"! ## "अयोध्या" को देखकर मेरे जेहन में एक ग़ज़ल तैर जाती है : "ज़िन्दगी एक है, और तलबग़ार दो / जाँ अकेली मगर, जाँ के हक़दार दो।" एक ही शहर में कितने गुण-अवगुण हैं! दो कौमों की नाभि और तीन धर्मों का पुण्यस्थान! आजकल हो रहे दो सभ्यताओं के टकराव की रणभूमि भी! और वर्तमान के भारतीय उपमहाद्वीप में शांति स्थापना का एकमात्र जरिया भी! वर्तमान में तमाम सम्प्रदायों का एक सर्वव्यापी गृह, किन्तु हर एक को लगता है कि ये सिर्फ उनका है, केवल उनका! प्रत्येक सम्प्रदाय की सं...